Kohinoor : कोहिनूर दुनिया का सबसे मशहूर हीरा है। फारसी में इसका नाम “कोह-ए-नूर” है, जिसका अर्थ है “रोशनी का पर्वत”। यह हीरा भारत की कोल्लूर खदान (गोलकुंडा क्षेत्र, आंध्र प्रदेश) से निकला था। प्राचीन समय में भारत हीरे का सबसे बड़ा उत्पादक देश था।14वीं शताब्दी में यह काकातीय राजवंश के पास था। 1323 में दिल्ली सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी के सेनापति ने वारंगल पर आक्रमण कर इसे लूट लिया। 16वीं शताब्दी में यह मुगल सम्राट बाबर के हाथ आया। मुगल बादशाहों ने इसे बहुत संभालकर रखा। सम्राट शाहजहां ने इसे तख्त-ए-ताऊस (मोर सिंहासन) पर जड़वाया। उस समय इसका वजन करीब 186-191 कैरेट था।1739 में ईरान के नादिर शाह ने दिल्ली पर हमला किया और मुगल खजाने को लूट लिया। नादिर शाह ने हीरे को देखकर कहा, “कोह-ए-नूर!” यहीं से यह नाम प्रसिद्ध हुआ।
नादिर शाह की मृत्यु के बाद 1747 में यह अफगान शासक अहमद शाह अब्दाली (दुर्रानी) के पास चला गया।19वीं शताब्दी की शुरुआत में अफगानिस्तान में अंदरूनी कलह थी। शाह शुजा नामक राजकुमार कैद था। पंजाब के महाराजा रणजीत सिंह ने उसकी मदद की और बदले में 1813 में कोहिनूर हीरा प्राप्त कर लिया। महाराजा रणजीत सिंह इसे बहुत प्यार करते थे। वे इसे अपनी पगड़ी या कंगन में लगाकर रखते थे।1839 में रणजीत सिंह की मृत्यु के बाद पंजाब में उत्तराधिकार की लड़ाई शुरू हो गई। दो एंग्लो-सिख युद्धों के बाद 1849 में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने पंजाब पर कब्जा कर लिया। महाराजा दुलीप सिंह उस समय मात्र 10-11 वर्ष के थे। ब्रिटिश गवर्नर लॉर्ड डलहौजी ने लाहौर संधि के तहत दुलीप सिंह से कोहिनूर हीरा छीन लिया।1850 में यह हीरा ब्रिटेन भेज दिया गया और महारानी विक्टोरिया को भेंट किया गया। 1852 में लंदन में इसे फिर से काटा गया। पुराना वजन 186 कैरेट से घटकर 105.6 कैरेट रह गया। नई कटिंग से इसकी चमक बढ़ गई। विक्टोरिया इसे ब्रोच की तरह पहनती थीं। आज यह ब्रिटिश क्राउन ज्वेल्स का हिस्सा है और लंदन के टावर ऑफ लंदन में क्वीन मदर के ताज पर जड़ा हुआ प्रदर्शित है।
कोहिनूर की यात्रा भारत → मुगल → ईरान → अफगानिस्तान → पंजाब → ब्रिटेन तक चली। यह कभी खरीदा-बेचा नहीं गया, बल्कि युद्ध, लूट और संधियों के जरिए हाथ बदला। भारत, पाकिस्तान, ईरान और अफगानिस्तान इसे अपना बताते हैं, लेकिन कानूनी रूप से यह ब्रिटेन के पास है। ब्रिटेन इसे वापस देने से इनकार करता रहा है।कोहिनूर सिर्फ एक हीरा नहीं, बल्कि सदियों के इतिहास का जीवंत गवाह है। इसमें मुगलों की भव्यता, नादिर शाह की विजय, रणजीत सिंह की बहादुरी और ब्रिटिश साम्राज्यवाद की पूरी कहानी समाई हुई है। आज भी लाखों लोग इसे देखने टावर ऑफ लंदन जाते हैं।


