Maharashtra:सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया ने हाल ही में बॉम्बे हाई कोर्ट के उस फैसले पर रोक लगा दी है, जिसमें 2006 के मुंबई ट्रेन धमाकों के मामले में 12 मुस्लिम युवकों को बरी किया गया था। यह मामला 11 जुलाई 2006 को हुए मुंबई के सिलसिलेवार ट्रेन धमाकों से जुड़ा है, जिनमें 189 लोग मारे गए थे और 800 से अधिक घायल हुए थे। इन धमाकों के सिलसिले में 13 लोगों को गिरफ्तार किया गया था, जिनमें से 12 को 2015 में ट्रायल कोर्ट ने दोषी ठहराया था। ट्रायल कोर्ट ने पांच आरोपियों को फांसी और सात को आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी.

।बॉम्बे हाई कोर्ट ने 2025 में अपने फैसले में इन 12 आरोपियों को बरी कर दिया था, जिन्हें ट्रायल कोर्ट ने दोषी करार दिया था। हाई कोर्ट का कहना था कि अभियोजन पक्ष आरोपियों के खिलाफ ठोस सबूत पेश करने में विफल रहा और यह साबित नहीं हो सका कि ये आरोपी धमाकों में प्रत्यक्ष रूप से शामिल थे। इस फैसले के खिलाफ महाराष्ट्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की। सुप्रीम कोर्ट ने इस अपील पर सुनवाई करते हुए बॉम्बे हाई कोर्ट के फैसले पर रोक लगा दी।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि बॉम्बे हाई कोर्ट का फैसला मकोका (MCOCA) के तहत सुनाए गए मामलों के लिए मिसाल नहीं बनेगा। हालांकि, कोर्ट ने यह भी कहा कि फिलहाल आरोपियों को दोबारा जेल भेजने की जरूरत नहीं है, यानी वे अगली सुनवाई तक गिरफ्तारी से सुरक्षित रहेंगे। कुछ लोगों ने इसे न्याय की जीत माना, जबकि कुछ ने इसे न्यायिक प्रक्रिया में देरी का कारण बताया। यह मामला केवल कानूनी दृष्टिकोण से ही नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक रूप से भी संवेदनशील है, क्योंकि इसमें जाति, धर्म और आतंकवाद से जुड़े आरोप शामिल हैं। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला दर्शाता है कि वह इस मामले की गहराई से जांच करना चाहती है ताकि न्याय सुनिश्चित हो सके। इस मामले में अगली सुनवाई से और स्पष्टता की उम्मीद है। यह फैसला न केवल कानूनी प्रक्रिया को प्रभावित करता है, बल्कि समाज में व्यापक बहस को भी जन्म देता है।


