Haryana:नई दिल्ली, 26 अगस्त, 2025: अशोका विश्वविद्यालय के प्रोफेसर अली खान महमूदाबाद के खिलाफ हरियाणा पुलिस द्वारा दर्ज दो प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण हस्तक्षेप किया है। ये FIR उनके सोशल मीडिया पोस्ट्स से संबंधित हैं, जो कथित तौर पर ‘ऑपरेशन सिंदूर’ पर टिप्पणी करते थे। कोर्ट ने एक FIR को रद्द कर दिया और दूसरे पर ट्रायल कोर्ट की कार्यवाही पर रोक लगा दी। यह मामला भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अकादमिक स्वायत्तता पर गंभीर सवाल उठाता है।प्रोफेसर अली खान महमूदाबाद, जो इतिहास और राजनीति विज्ञान के विद्वान हैं, को 18 मई, 2025 को हरियाणा पुलिस ने गिरफ्तार किया था। उनकी गिरफ्तारी उनके X पोस्ट्स के कारण हुई, जिनमें उन्होंने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के बाद आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस को “पाखंड” बताया और कथित तौर पर कर्नल सोफिया कुरैशी और विंग कमांडर व्योमिका सिंह का नाम लिया। पुलिस ने दावा किया कि ये पोस्ट्स देश की संप्रभुता और अखंडता के लिए खतरा थे।

दो FIR दर्ज की गईं: पहली FIR: हरियाणा राज्य महिला आयोग की अध्यक्ष रेणु भाटिया की शिकायत पर, जिसमें प्रोफेसर पर महिलाओं के प्रति अपमानजनक टिप्पणी और सामाजिक सौहार्द बिगाड़ने का आरोप था।दूसरी FIR: एक स्थानीय सरपंच की शिकायत पर, जिसमें समान आरोप शामिल थे। इन FIRs में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धाराओं 152 (देशद्रोह), 353 (सार्वजनिक शरारत), 79 (महिला की मर्यादा को ठेस), और 196(1) (धर्म के आधार पर शत्रुता) के तहत मामला दर्ज किया गया।

25 अगस्त, 2025 को, जस्टिस सूर्या कांत और जस्टिस जॉयमाला बागची की पीठ ने मामले की सुनवाई की। हरियाणा पुलिस ने बताया कि: पहली FIR में क्लोजर रिपोर्ट दाखिल की गई, जिसके आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने इसे रद्द कर दिया।दूसरी FIR में चार्जशीट 22 अगस्त, 2025 को दाखिल की गई। कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट को इस पर संज्ञान लेने या आरोप तय करने से रोक दिया।

प्रोफेसर के वकील, वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने चार्जशीट को “दुर्भाग्यपूर्ण” बताया और कहा कि धारा 152 (देशद्रोह) की वैधता सुप्रीम कोर्ट में चुनौती के अधीन है। उन्होंने विशेष जांच दल (SIT) की जांच के दायरे पर सवाल उठाया, जिसमें प्रोफेसर की विदेश यात्राओं और डिजिटल उपकरणों की जांच शामिल थी। जस्टिस सूर्या कांत ने टिप्पणी की, “आपको उनकी (महमूदाबाद) जरूरत नहीं, आपको एक शब्दकोश की जरूरत है,” यह इंगित करते हुए कि जांच पोस्ट्स की सामग्री तक सीमित रहनी चाहिए।

कोर्ट ने SIT को चार सप्ताह में जांच पूरी करने और प्रोफेसर को दोबारा समन न करने का निर्देश दिया।21 मई, 2025: सुप्रीम कोर्ट ने प्रोफेसर को अंतरिम जमानत दी, लेकिन जांच पर रोक से इनकार किया। कोर्ट ने हरियाणा DGP को तीन वरिष्ठ IPS अधिकारियों (एक महिला सहित) का SIT गठन करने का निर्देश दिया।16 जुलाई, 2025: कोर्ट ने SIT की जांच की दिशा पर सवाल उठाया, इसे “गलत दिशा” में बताया और जांच को FIRs तक सीमित करने को कहा। 42 वर्षीय प्रोफेसर महमूदाबाद अशोका विश्वविद्यालय में पढ़ाते हैं और दक्षिण एशियाई इतिहास व राजनीति पर अपने विचारों के लिए जाने जाते हैं। उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि उत्तर प्रदेश के महमूदाबाद की पूर्व रियासत से जुड़ी है। वे कवि और कॉलमिस्ट भी हैं, जिनके X पोस्ट्स ऐतिहासिक अंतर्दृष्टि और समकालीन विश्लेषण को जोड़ते हैं। यह मामला अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर बढ़ते दबाव को दर्शाता है।

आलोचकों का कहना है कि प्रोफेसर की मुस्लिम पहचान ने उन्हें निशाना बनाया। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने भी FIR के तरीके पर स्वत: संज्ञान लिया। यह घटना अकादमिक स्वतंत्रता और अल्पसंख्यक आवाजों पर सवाल उठाती है। प्रोफेसर अली खान महमूदाबाद का मामला भारत में बौद्धिक स्वतंत्रता की सीमाओं को परिभाषित कर सकता है। सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप एक राहत है, लेकिन चार्जशीट और चल रही जांच इसकी जटिलता को दर्शाती है। अगली सुनवाई इस मामले के भविष्य को और स्पष्ट करेगी।


