Saturday, March 7, 2026
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जानिए पी के के ने कियों डाला हथियार :

2023 में जेल में बंद ओगलान ने पीकेके से हथियार छोड़ने और शांति की राह अपनाने को कहा। यह तुर्की के राष्ट्रपति रजब तैय्यप एर्दोगन के लिए बड़ी जीत थी। इस अपील के बाद कुछ पीकेके लड़ाकों ने हथियार डालने की बात शुरू की।

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Abida Sadaf
Abida Sadafhttp://globalboundary.in
आबिदा सदफ बीते 4 वर्षों से मीडिया से जुड़ी रही हैं। इन्किलाब अखबार से अपने पत्रकारिता जीवन की शुरूआत की थी। आबिदा सदफ मूल रूप से उत्तर प्रदेश के सिद्धार्थनगर जनपद की रहने वाली हैं.

turkiye:पीकेके क्या है?  पीकेके (Partiya Karkerên Kurdistan) एक कुर्द संगठन है जो कुर्द लोगों के अधिकारों के लिए लड़ता है। कुर्द एक जातीय समूह है जो तुर्की, इराक, सीरिया और ईरान के कुछ हिस्सों में रहता है। पीकेके की स्थापना 1978 में अब्दुल्ला ओगलान ने की थी। इसका मकसद शुरू में तुर्की में कुर्दों के लिए अलग देश बनाना था, लेकिन बाद में यह मांग बदलकर कुर्दों को तुर्की में अधिक अधिकार और स्वायत्तता (खुद का शासन) देने की हो गई।

1978 में अब्दुल्ला ओगलान ने तुर्की के दक्षिण-पूर्वी हिस्से में, जहां ज्यादातर कुर्द रहते हैं, पीकेके नाम से पार्टी बनाई। उस समय कुर्दों को तुर्की में अपनी भाषा, संस्कृति और पहचान के लिए बहुत कम अधिकार मिले थे। तुर्की सरकार कुर्दों को “पहाड़ी तुर्क” कहकर उनकी अलग पहचान को नकारती थी।

पीकेके ने मार्क्सवाद-लेनिनवाद को अपनाया, जो गरीबों और दबे-कुचले लोगों के लिए क्रांति की बात करता है। वे चाहते थे कि कुर्दों को बराबरी और आजादी मिले।

शुरू में पीकेके ने छोटे-मोटे प्रदर्शन और संगठन बनाना शुरू किया। 1984 में इसने तुर्की सरकार के खिलाफ हथियार उठाए और गुरिल्ला युद्ध शुरू किया।

1984 से पीकेके ने तुर्की की सेना और पुलिस पर हमले शुरू किए। ये हमले ज्यादातर दक्षिण-पूर्वी तुर्की में हुए, जहां कुर्द बहुसंख्यक हैं। इस दौरान हजारों लोग मारे गए, जिसमें सैनिक, पुलिस, पीकेके लड़ाके और आम नागरिक शामिल थे।तुर्की सरकार ने पीकेके को कुचलने के लिए बड़े सैन्य अभियान चलाए। कई कुर्द गांवों को नष्ट किया गया, और लाखों कुर्दों को अपने घर छोड़ने पड़े।

इस दौरान पीकेके को कुछ देशों (जैसे सीरिया) से छिपा समर्थन मिला, जहां वह अपने ठिकाने बनाता था। लेकिन 1990 के दशक में तुर्की ने पीकेके को आतंकवादी संगठन घोषित करवाने के लिए अंतरराष्ट्रीय दबाव बनाया।

1999 में पीकेके के नेता अब्दुल्ला ओगलान को केन्या में गिरफ्तार कर लिया गया। तुर्की ने उन्हें जेल में डाल दिया, और आज तक वे जेल में हैं। इस घटना ने पीकेके को कमजोर किया।

ओकलान की गिरफ्तारी के बाद पीकेके ने कुछ समय के लिए हमले रोक दिए और शांति की बात की। लेकिन यह शांति ज्यादा दिन नहीं चली।

2000 के दशक में पीकेके ने अपनी मांग को थोड़ा बदला। अब वे अलग देश की बजाय तुर्की के अंदर कुर्दों को ज्यादा अधिकार, जैसे अपनी भाषा बोलने की आजादी, कुर्दी स्कूल, और स्थानीय शासन की मांग करने लगे।

2004 में पीकेके ने फिर से हमले शुरू किए, क्योंकि तुर्की सरकार ने उनकी मांगों को ज्यादा गंभीरता से नहीं लिया। इस दौरान तुर्की ने उत्तरी इराक में पीकेके के ठिकानों पर हमले किए, जहां उनके कई लड़ाके छिपे थे।

2009 में तुर्की सरकार ने”कुर्द शांति प्रक्रिया शुरू की। इसमें पीकेके से हथियार डालने और कुर्दों को कुछ अधिकार देने की बात हुई, लेकिन यह कोशिश 2011-12 में विफल हो गई।

2015 में शांति वार्ता टूटने के बाद हिंसा फिर से बढ़ गई। पीकेके ने तुर्की के शहरों में बम हमले किए, और तुर्की ने पीकेके के खिलाफ बड़े सैन्य अभियान चलाए, खासकर इराक और सीरिया में।

सीरिया में गृहयुद्ध के दौरान पीकेके से जुड़े कुर्द समूह (जैसे YPG) ने ISIS के खिलाफ लड़ाई लड़ी। अमेरिका ने YPG को समर्थन दिया, जिससे तुर्की नाराज हुआ, क्योंकि वह YPG को पीकेके का हिस्सा मानता है।

तुर्की ने सीरिया और इराक में कुर्द ठिकानों पर ड्रोन और हवाई हमले किए। इससे पीकेके की ताकत कम हुई।

2023 में जेल में बंद ओगलान ने पीकेके से हथियार छोड़ने और शांति की राह अपनाने को कहा। यह तुर्की के राष्ट्रपति रजब तैय्यप एर्दोगन के लिए बड़ी जीत थी। इस अपील के बाद कुछ पीकेके लड़ाकों ने हथियार डालने की बात शुरू की।

2024 में सीरिया में बशर अल-असद की सरकार गिरने के बाद वहां के कुर्द समूह (YPG) कमजोर हुए। चूंकि YPG और पीकेके का गहरा रिश्ता है, इससे पीकेके पर भी असर पड़ा।

2025 तक पीकेके के कुछ छोटे समूहों ने हथियार डालने शुरू किए हैं, लेकिन पूरे संगठन ने अभी तक ऐसा नहीं किया। तुर्की की प्रो-कुर्द पार्टी (DEM) ने मांग की है कि पीकेके के हथियार डालने के बदले सरकार को कुर्दों को ज्यादा अधिकार और सुरक्षा देनी होगी।

अनुमान है कि पीकेके के पास अब 3,000-5,000 लड़ाके बचे हैं, जो पहले की तुलना में बहुत कम हैं। तुर्की के ड्रोन हमलों और सैन्य अभियानों ने उनकी ताकत को काफी कम किया है।

पीकेके को आतंकवादी क्यों माना जाता है?

तुर्की, अमेरिका, यूरोपीय संघ और कुछ अन्य देश पीकेके को आतंकवादी संगठन मानते हैं.

हालांकि, कुछ लोग और संगठन कहते हैं कि पीकेके कुर्दों के अधिकारों के लिए लड़ता है पीकेके के कुछ लोग हथियार डालना चाहते हैं, लेकिन कुछ कट्टरपंथी इसके खिलाफ हैं। वे कहते हैं कि तुर्की सरकार पर भरोसा नहीं किया जा सकता।

तुर्की सरकार पीकेके को पूरी तरह खत्म करना चाहती है। वह शांति की बात तो करती है, लेकिन कुर्दों को ज्यादा अधिकार देने में हिचकिचाती है।

कुर्द चाहते हैं कि उनकी भाषा, संस्कृति और राजनीतिक अधिकारों को मान्यता मिले। बिना इस के पीकेके का हथियार डालना मुश्किल है।

निष्कर्ष पीकेके की शुरुआत कुर्दों के लिए आजादी की लड़ाई से हुई थी, लेकिन 40 साल से ज्यादा के संघर्ष में यह संगठन कमजोर हो गया है। तुर्की के सैन्य दबाव, ओगलान की अपील और सीरिया में बदलते हालात ने पीकेके को हथियार डालने की ओर धकेला है। लेकिन यह प्रक्रिया आसान नहीं है, क्योंकि तुर्की सरकार और पीकेके के बीच विश्वास की कमी है। अगर तुर्की सरकार कुर्दों को कुछ अधिकार देती है, तो शायद पीकेके पूरी तरह हथियार डाल दे और शांति की राह पर आजाए.

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  • आबिदा सदफ बीते 4 वर्षों से मीडिया से जुड़ी रही हैं। इन्किलाब अखबार से अपने पत्रकारिता जीवन की शुरूआत की थी। आबिदा सदफ मूल रूप से उत्तर प्रदेश के सिद्धार्थनगर जनपद की रहने वाली हैं.

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